
निष्पादन मूल्यांकन का अर्थ एवं परिभाषाएँ
किसी व्यक्ति का कार्य निष्पादन के संदर्भ में एवं उसके भावी विकास की संभावनाओं के संदर्भ में (उसका) व्यवस्थित मूल्यांकन करना निष्पादन मूल्यांकन कहलाता है। अन्य शब्दों में, किसी कर्मचारी या उसके वर्तमान कार्य के संबंध में एवं उच्चतर कार्य के लिए उसकी क्षमाताओं का व्यवस्थित मानवीय ढंग से यथासंभव एक निष्पादन मूल्यांकन को ‘निष्पादन मूल्यांकन’ या कार्य निष्पादन मूल्यांकन के नाम से जाना जाता है।
निष्पादन मूल्यांकन की अन्य परिभाषा- निष्पादन मूल्यांकन का अर्थ एक व्यक्ति की योग्यताओं एवं क्षमताओं के औपचारिक मूल्यांकन का सही माप ज्ञात किया जा सके और व्यक्तियों के गुणों एवं दोषों का निष्पादन मूल्यांकन भी किया जा सके। यहाँ यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि निष्पादन मूल्यांकन एवं योग्यता मूल्यांकन में अंतर है अथवा नहीं ? इसके प्रत्युत्तर में यह कहा जा सकता है कि योग्यता मूल्यांकन एक प्राचीन शब्दावली है जो आधुनिक युग में विभिन्न ग्रंथों से विलुप्त हो गई। अब इसके स्थान पर नयी शब्दावली ‘निष्पादित मूल्यांकन’ का प्रयोग किया जाता है।
हालांकि इन दोनों में कोई विशेष अंतर तो नहीं है, फिर भी कुछेक अंतर अवश्य हैं, जो इस प्रकार हैं-
(1) योग्यता मूल्यांकन एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति की योग्यता का मूल्यांकन करके यह ज्ञात किया जाता है कि वह क्या है और उसमें कौन-कौन सी योग्यताएँ हैं वह किस कार्य के लिए उपयोगी है। जबकि निष्पादन मूल्यांकन द्वारा यह ज्ञात किया जाता है कि वह क्या करता है ?
(2) योग्यता मूल्यांकन के द्वारा कर्मचारी को व्यक्ति के रूप में उपादेयता का मूल्यांकन किया जाता है, जबकि निष्पादन मूल्यांकन के द्वारा उसके कार्य का मूल्यांकन किया जाता है।
(3) योग्यता मूल्यांकन में कर्मचारी द्वारा कार्य करने में लगायी गयी योग्यताओं तथा क्षमताओं का मूल्यांकन किया जाता है, जबकि निष्पादन मूल्यांकन में कर्मचारी की योग्यताओं से प्राप्त कार्य के परिणामों का मूल्यांकन किया जाता है।
वस्तुतः उपर्युक्त सभी अंतर सैद्धान्तिक हैं, जबकि इन दोनों को एक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। इसका कारण यह है कि इसमें किसी कर्मचारी के निष्पादन एवं योग्यताओं का उस कार्य की अपेक्षाओं के संदर्भ में मूल्यांकन किया जाता है जिसके लिए उसे नियुक्त किया। गया है। इस प्रकार हम योग्यता एवं निष्पादित मूल्यांकन को समानार्थक मानते हुए अन्य शीर्षकों को स्पष्ट करेंगे।
निष्पादन मूल्यांकन की उपयोगिता एवं महत्त्व (Utility and Importance of Performance Appraisal)
निष्पादन/योग्यता मूल्यांकन जहाँ व्यावसायिक प्रशासन का एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है, वहाँ कर्मचारियों की योग्यताओं का माप करने का एक महत्त्वपूर्ण साधन भी है। इसका कारण यह भी है कि कर्मचारियों के सेवीवर्गीय कार्य एवं उनके विकास संबंधी कार्य, योग्यता अंकन के आधार पर किये जाते हैं और पक्षपात, अन्याय एवं भेदभाव जैसी दूषित मनोवृत्तियों का उन्मूलन भी होता है।
निष्पादन मूल्यांकन की उपयागिता एवं महत्त्व का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है-
(1) कर्मचारियों का आत्म-विकास- निष्पादन मूल्यांकन के आधार पर प्रत्येक कर्मचारी यह जानकारी प्राप्त कर लेता है कि वह अन्य सहयोगियों की तुलना में किस स्थिति पर है और उसे कितने सुधार की आवश्यकता है। पर्यवेक्षक को यह भी पता लगाता है कि कार्य में गति लाने और किस्म सुधारने की दृष्टि से उसे किस कर्मचारी को कितना अधिक पर्यवेक्षित करना चाहिए।
(2) पारितोषण एवं दण्ड प्रक्रिया में सहायक– निष्पादन / योग्यता मूल्यांकन को अतिरिक्त कर्मचारियों को पुरस्कृत करने अथवा दण्ड देने के आधार पर बताया जा सकता है। इसके आधार पर उन कर्मचारियों को जो अपना कार्य अधिक कार्य कुशलता से करते हैं, पारिश्रमिक अथवा पारितोषिक प्रदान किया जा सकता है। इसी प्रकार कार्य न करने वाले कर्मचारियों को दण्डित किया जा सकता है।
( 3 ) सेवीवर्गीय प्रशासन एवं प्रबंध का सहज होना- निष्पादन/ योग्यता मूल्यांकन से संस्था का सेवीवर्गीय प्रशासन एवं प्रबंध सहज हो जाता है, क्योंकि इसके आधार पर ही कर्मचारियों की भर्ती, चयन, वेतन वृद्धि, पदोन्नति एवं हस्तान्तरण किया जाता है। यही नहीं, कर्मचारियों की नियुक्ति किस आधार पर की जाय अस्थायी, प्रोबेशन एवं स्थायी आदि भी योग्यता मूल्यांकन के आधार पर की जाती है। इस प्रकार मंद योग्यता मूल्यांकन को सेवीवर्गीय प्रशासन का महत्त्वपूर्ण अंग कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
(4) प्रशिक्षण संबंधी उद्देश्यों की पूर्ति- निष्पादन/ योग्यता मूल्यांकन से दो दृष्टियों से प्रशिक्षण संबंधी उद्देश्यों की पूर्ति होती है-
(i) यह पता लगता है कि किन क्षेत्रों में श्रमिक दक्ष हैं और किन क्षेत्रों में अकुशल, अक्षम कर्मचारियों को विकसित करने के लिए, उन्हें प्रशिक्षण प्रदान किया जा सकता है अथवा प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए कहा जा सकता है।
(ii) इसमें विशिष्ट प्रशिक्षण चाहने वाले व्यक्तियों एवं सामान्य प्रशिक्षण चाहने वाले व्यक्तियों में भेद किया जा सकता है।
इस प्रकार निष्पादन मूल्यांकन से यह पता लगता है कि कर्मचारियों को किस स्तर का प्रशिक्षण दिया जाय।
(5) भेदभाव, पक्षपात एवं अन्याय का उन्मूलन- निष्पादन मूल्यांकन में लिखित एवं अभिलेख के आधार पर कार्य किये जाते हैं जिससे कर्मचारियों के साथ कोई भेदभाव नहीं होता है, पक्षपात नहीं किया जाता है एवं किसी कर्मचारी के साथ कोई अन्याय भी नहीं होता है।
(6) कर्मचारी मनोबल बनाये रखना- निष्पादन मूल्यांकन से कर्मचारियों का मनोबल बना रहता है क्योंकि प्रत्येक कर्मचारी यह अनुभव करने लगता है कि उसकी योग्यताओं की पहचान कर उसका सम्मान किया जाता है।
(7) निष्पक्ष अनुशासन व्यवस्था- योग्यता मूल्यांकन में अभिलेख के आधार पर किसी कर्मचारी को अच्छा या बुरा या दोषी बताया जाता है। इसके अतिरिक्त योग्यता मूल्यांकन, अभिलेख ही उसे सापेक्षित रूप से अच्छा, कुशल, बुरा, अयोग्य या दोषी ठहरा सकता है। ऐसी दशा में निष्पक्ष अनुशासन व्यवस्था हो सकती है।
(8) अमिकों एवं प्रबंधकों के लिए मार्गदर्शन- योग्यता मूल्यांकन से श्रमिकों एवं प्रबंधकों को मार्गदर्शन मिलता है-
(i) कर्मचारी किस कार्य के लिए योग्य है और किसके लिए नहीं।
(ii) दुर्बलताओं एवं कमियों के आधार पर उनमें सुधार के उपाय हो सकते हैं।
(iii) नियोक्ताओं की शिकायतों को दूर करने में योग्यता मूल्यांकन काफी उपयोगी साबित हुआ है।
(iv) प्रबंधकों को निर्णय के संबंध में न्यायपूर्वक चलने पर बाध्य किया जाता है।
(v) प्रबंधक को श्रम शक्ति की योग्यता का ज्ञान हो जाता है।
(9) उत्तम एवं प्रभावशाली पर्यवेक्षण- जब किसी व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों के कार्य टिप्पणी करने का अधिकार प्राप्त होता है, तो वह अधिक सतर्कता से देखरेख का कार्य सम्पन्न करता है। योग्यता मूल्यांकन से अधीनस्थों का सही एवं निष्पक्ष मूल्यांकन करने की इच्छा से उसके स्वयं के कार्य में सुधार आता है और इस प्रकार पर्यवेक्षण का कार्य अधिक प्रभावशाली ढंग से सम्पन्न किया जाता है।
(10) अन्य उपयोगिता एवं महत्त्व-
(i) चयन प्रक्रिया का मापन संभव है।
(ii) योग्यता मूल्यांकन के परिणाम अधिक सही एवं विश्वसनीय होते हैं।
(iii) योग्यता मूल्यांकन से कर्मचारियों की नियुक्ति की पुष्टि होती है।
(iv) कर्मचारी अधिक कार्य करने के लिए प्रेरित होते हैं।
(v) अधिकारी अपने अधीनस्थों की विशेषताओं एवं विशिष्ट रुचियों को ज्ञात कर सही स्थान पर नियुक्त कर सकते हैं।
निष्पादन / योग्यता मूल्यांकन की विभिन्न विधियाँ (Different Methods of performance/Merit Appraisal)
कर्मचारियों की योग्यताओं का मूल्यांकन करने की अनेक विधियाँ हैं, उनमें से महत्त्वपूर्ण विधियाँ निम्नलिखित हैं-
(1) बिन्दु विधि (Point Method) — यह विधि इस मान्यता पर आधारित है कि विभिन्न कार्यों से संबंधित प्रत्येक घटक के उसके महत्त्व के अनुसार बिन्दु (अंक) निर्धारित किये जाते हैं और इसके लिए मैनुअल का प्रयोग किया जाता है। तत्पश्चात् इन अंकों के आधार पर एक तालिका तैयार की जाती है उस आधार पर प्राप्त अंकों का पता करके सभी कर्मचारियों की योग्यता को आँका जाता है
(2) श्रेणीयन विधि (Grading Method) निष्पादन मूल्यांकन की विधि में मूल्यांकन कर्ता सभी कर्मचारियों की योग्यताओं के मूल्यांकन के लिए कुछ श्रेणियाँ निर्धारित कर लेते हैं, जैसे—विलक्षण, बहुत अच्छा, औसत, खराब, बहुत खराब आदि। तत्पश्चात् यह विभिन्न गुणों, कार्य की मात्रा, कार्य की किस्म, पहल शक्ति, उद्यम, चतुराई, वफादारी, कल्पना शक्ति, सहयोग एवं स्वास्थ्य आदि के अन्तर्गत उन श्रेणियों में निशान लगा लेते हैं और फिर उनके आधार पर तुलना कर लेते हैं। इस प्रकार एक रिपोर्ट तैयार हो जाती है। किन्तु यह समस्त कार्य बौद्धिक कार्य होने के कारण सरल नहीं हैं।
(3) व्यक्ति-दर-व्यक्ति तुलना विधि (Man to Man Comparison Method)- इसमें योग्यता मूल्यांकन हेतु कुछ घटक जैसे—नेतृत्व, विश्वसनीयता तथा पहल करने की क्षमता आदि निश्चित किये जाते हैं और प्रत्येक घटक के लिए एक मापक तैयार किया जाता है। इसी प्रकार का मापक व्यक्ति के लिए भी बनाया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति की जिसकी श्रेणी निर्धारित की जा रही है, प्रमापित व्यक्ति से उसकी तुलना की जाती है, और उसे प्रत्येक घटक के लिए अंक दिये जाते हैं। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की आपस में तुलना करने की अपेक्षा व्यक्ति की तुलना एक आदर्श व्यक्ति से की जाती है और उसके एक घटक की एक ही बार तुलना की जाती है। इसलिए इसे ‘घटना तुलना विधि’ भी कहते हैं।
(4) बलात् वितरण विधि- किसी विभाग के कर्मचारियों की संख्या अधिक होने पर इस विधि का उपयोग किया जाता है। इसमें मूल्यांकनकर्ता द्वारा अपने अंकन का एक निश्चित कार्य विभाजन किया जाता है जो साधारण आवृत्ति बंटन के समान होता है। कर्मचारियों के मूल्यांकन के आधार पर इन वर्गों में ही स्थान दिया जाता है।
उदाहरण के लिए, निम्नतम 10% अगले 20% मध्यम 40% अगले 20% उच्चतम 10% आदि । एक कर्मचारी का वितरण इन प्रतिशत वर्गों में इस प्रकार होगा, प्रथम 10% उच्च वर्ग में अगले 20% अगले वर्ग में 40% मध्यम वर्ग में अगले 20%, अगले वर्ष में निम्नतम 10% अन्तिम वर्ग में स्थान प्राप्त करेंगे।
(5) जाँच सूची विधि (Check List Method) — इस विधि में मूल्यांकन के लिए आवश्यक गुणों की एक सूची तैयार की जाती है। मूल्यांकनकर्त्ता, मूल्यांकन के लिए इन गुणों की विद्यमानता अथवा अभाव के संबंध में हाँ या नहीं में उत्तर देता है (तत्पश्चात्) वह रिपोर्ट करता है कि निर्धारित किये गये आवश्यक गुणों में से कौन से उसमें हैं एवं कौन-कौन से नहीं हैं। मूल्यांकनकर्ता प्रत्येक कर्मचारी को एक-एक बात ध्यान में रखकर सूची को पढ़ता है और उसके अनुसार इसमें है ‘है’ या ‘नहीं’ अथवा अन्य निर्धारित चिह्न लगता है जाँच सूची विधि का एक बार निर्माण कर लेने के पश्चात् मूल्यांकनकर्ता द्वारा इसको समझना एवं उत्तर देना सरल कार्य हो जाता है। परन्तु इस संबंध में एक कठिनाई यह है कि विभिन्न कार्यों की आवश्यकता, स्वामी, एवं प्रकृति में अंतर होने के कारण प्रत्येक कार्य के लिए अलग-अलग जाँच सूचियों के निर्माण की आवश्यकता होती है।
(6) पारस्परिक उद्देश्य निर्धारण विधि— योग्यता मूल्यांकन की इस विधि में मूल्यांकन द्वारा कर्मचारी से आगामी कुछ समय के लिए समुचित उद्देश्यों की सूची बनाने को कहा जाता है। इसमें कर्मचारी के योगदान को अधिक महत्त्व दिया जाता है, न कि उसकी विशेषताओं को। जब नीति या योजना पर विचार-विमर्श किया जाता है तो कर्मचारी एवं पर्यवेक्षक आपस में विचार-विमर्श करते हैं और सम्मिलित रूप से योजना को अन्तिम रूप दिया जाता है। निर्धारित समय की समाप्ति पर दोनों एक बार फिर मिलते हैं जिसमें निर्धारित लक्ष्यों एवं प्राप्त उपलब्धियाँ की तुलना की जाती है।
(7) विवरणात्मक मूल्यांकन विधि (Descriptive Appraisal Methods)- योग्यता मूल्यांकन की इस विधि में, मूल्यांकनकर्ता कर्मचारी के संबंध में एक लिखित विवरण तैयार करता है। जिसके अन्तर्गत उसके व्यक्तित्व, आचरण एवं कार्य की समालोचनात्मक व्याख्या की जाती है। इस विवरण के विश्लेषण द्वारा ही कर्मचारी का मूल्यांकन किया जाता है। कर्मचारी के कार्य व्यवहार का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है, परन्तु इसका उपयोग निष्पादन मूल्यांकन की तुलनात्मक विधियों के साथ किया जाता है।
(8) आलोचनात्मक घटना विधि (Critical Incident Method)— योग्यता मूल्यांकन की यह विधि इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक कर्मचारी अपने सेवाकाल में परिस्थितिवश विशेष प्रकार का आचरण करता है और ऐसे आचरण कार्य-निष्पादन की सफलता अथवा असफलता का कारण बन जाते हैं। इस विधि में कर्मचारी के आलोचनात्मक आचरण को रिकार्ड किया जाता है। कर्मचारी जब कोई ऐसा कार्य करता है, जिस पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। कर्मचारी के आलोचनात्मक कार्यों का वर्गीकरण निश्चित वर्गों में किया जाता है और इन वर्गों में सम्मिश्रण आचरण करने पर मूल्यांकन कर्मचारी के आचरण का रिकार्ड तैयार कर लेता है जिसके आधार पर इसका मूल्यांकन किया जा सकता है। इस विधि का मुख्य लाभ यह होता है कि इसमें कर्मचारी की योग्यता का मूल्यांकन व्यक्तिपरक न होकर उपस्थित साक्ष्यों पर आधारित होता है।
(9) मूल्यांकन केन्द्र विधि ( Assessment Centre Method)— इसमें कर्मचारियों की सम्भावित योग्यताओं, क्षमताओं का मूल्यांकन किया जाता है। इसके अन्तर्गत कर्मचारियों का एक साथ कई प्रकार, जैसे— पेपर पेन्सिल टेस्ट, व्यावसायिक खेल, भूमिका निर्वाह एवं समूह परिचर्चा आदि से मूल्यांकन किया जाता है।